अमर सिंह चमकिला: एक बायोपिक की कहानी
एक दिन, जब सर्दी की ठंड ने पंजाब के गांव मेहसंपुर को अपनी गोद में समेट रखा था, उस दिन की धूप में छिपा था एक दर्दनाक सच। 8 मार्च 1988 को, दो गायक, अमर सिंह चमकिला और उनकी पत्नी अमरजोत कौर, अपनी सफलता और प्यार की कहानी को एक खूबसूरत मोड़ देते हुए, अचानक एक निर्दयी हत्या का शिकार हो गए। यह कहानी केवल दो प्रतिभाशाली कलाकारों की नहीं, बल्कि एक ऐसी जोड़ी की है जो दुख और खुशी, दोनों को साथ जीती थी।
अमरजोत कौर की अनकही कहानी
आज, 2024 में, इस जोड़ी की कहानी को इम्तियाज अली ने बड़े पर्दे पर जीवंत किया है। लेकिन क्या सच में हमें यह कहानी सुनाने के लिए अमरजोत कौर को फिर से मरना पड़ा? क्या उनकी भूमिका को हल्का करके हम चमकिला की महानता को मान्यता दे सकते हैं? यह सवाल हमें सोचने पर मजबूर करता है।
अमरजोत कौर, जिन्होंने अपने पति के साथ मिलकर हर मंच की रौनक बढ़ाई, क्या उनकी कला और मेहनत को नजरअंदाज किया जा सकता है? हम अक्सर सुनते हैं कि हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला होती है, लेकिन इस बायोपिक में अमरजोत की भूमिका को छुपा दिया गया है। क्या यह उचित है कि हम एक की सफलता को दूसरे की कीमत पर मनाएं?
बायोपिक का उद्देश्य
बायोपिक्स एक ऐसा माध्यम हैं जो किसी के जीवन को अमर बना देते हैं। अमर सिंह चमकिला की कहानी को दर्शाने का यह एक सुनहरा मौका था, लेकिन क्या इसके साथ अमरजोत कौर की कहानी को भुला देना सही है? फिल्म ने हमें यह सोचने पर मजबूर किया है कि क्या हम सिर्फ एक पुरुष की कहानी को सुनने में इतने व्यस्त हैं कि हम एक महिला की समान भागीदारी को भूल जाते हैं?
परिनीती चोपड़ा का योगदान
फिल्म में परिनीती चोपड़ा ने अमरजोत कौर की भूमिका निभाई, और उनके अदाकारी की तारीफ होनी चाहिए। लेकिन क्या उन्हें वो पहचान मिली जो उन्हें मिलनी चाहिए थी? जब हम दिलजीत दोसांझ की तारीफ करते हैं, तो क्या हम परिनीती की मेहनत को नजरअंदाज कर रहे हैं? क्या यह सही है कि हम एक कलाकार को दूसरे के साए में छुपा दें?
अमरजोत कौर का दो बार मारा जाना
8 मार्च 1988 को, अमरजोत ने सिर्फ एक बार नहीं, बल्कि दो बार अपनी पहचान खोई। पहले एक भयानक हत्या में और फिर एक बायोपिक में, जहां उनकी भूमिका को कमतर आंका गया। क्या इम्तियाज अली के लिए यह जानना आवश्यक नहीं था कि यह कहानी केवल चमकिला की नहीं, बल्कि अमरजोत कौर की भी है?
इस कहानी को देखने के बाद, हम सोचने पर मजबूर होते हैं कि क्या हमें अपने समाज में महिलाओं की भूमिका को सही मायनों में पहचानने की जरूरत नहीं है? क्या हम सभी को यह समझने की आवश्यकता नहीं है कि हर कहानी में एक महिला का योगदान उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना कि पुरुष का?
यह बायोपिक नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है।
क्या आप मानते हैं कि हमें अपनी सांस्कृतिक कहानियों में महिलाओं के योगदान को और अधिक प्रमुखता से उजागर करना चाहिए?









