"Pharma": एक सोचने पर मजबूर करने वाली वेब सीरीज़
जब हम दवा की एक पिल लेते हैं, तो क्या हम कभी सोचते हैं कि इसके पीछे की कहानी क्या है? यही सवाल फिल्म "फार्मा" हमें सोचने पर मजबूर करती है। मलयालम सिनेमा के चर्चित अभिनेता निविन पौली और निर्देशक पीआर अरुण ने मिलकर एक ऐसी कहानी पेश की है, जो न केवल मनोरंजक है, बल्कि समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी देती है।
कहानी का सार
"फार्मा" की कहानी केपी विनोद (निविन पौली) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक मेडिकल प्रतिनिधि के रूप में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है। एक जादुई दवा "कायडॉक्सिन" उसकी किस्मत बदल देती है, लेकिन उसे जल्दी ही यह एहसास होता है कि वह मरीजों को क्या बेचा रहा है। इसके बाद, वह एक मुहिम छेड़ता है, जिसमें उसे डॉ. राजीव राव (राजित कपूर) और एनजीओ ज़ाथी का सहयोग मिलता है।
अभिनय का जादू
निविन पौली ने केपी के किरदार को बखूबी निभाया है, जिसमें उनकी हर भावनाएं झलकती हैं। उन्होंने एक उत्साही लेकिन संघर्षरत युवा के रूप में दर्शकों को प्रभावित किया है। वहीं, श्रुति रामचंद्रन ने डॉ. जानकी की भूमिका में दिल छू लेने वाली परफॉरमेंस दी है। राजित कपूर का अभिनय भी सराहनीय है, जो वर्षों बाद मलयालम सिनेमा में लौटे हैं।
निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी
निर्देशक पीआर अरुण ने "फार्मा" के लिए एक ऐसा वातावरण तैयार किया है, जो हल्के-फुल्के हास्य और गंभीर मुद्दों का बेहतरीन मिश्रण है। हालांकि, कुछ दृश्य थोड़े पूर्वानुमानित हैं, लेकिन फिर भी कहानी की प्रगति दर्शकों को बांधे रखती है।
संगीत और दर्शकों की प्रतिक्रिया
संगीत ने कहानी में जान डालने का काम किया है। दर्शकों की प्रतिक्रिया भी सकारात्मक रही है, और कई लोगों ने इसे एक जागरूकता अभियान के रूप में देखा है।
निष्कर्ष
"फार्मा" एक ऐसा अनुभव है, जो आपको सोचने पर मजबूर करता है कि हम जो दवाएं लेते हैं, वे कितनी सुरक्षित हैं। यह सीरीज़ ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है। इसे 5 में से 3 अंक दिए गए हैं।
तो, क्या आप अगली बार दवा लेते समय उसकी कहानी के बारे में सोचेंगे? यह सवाल शायद आपको गहराई से सोचने पर मजबूर कर देगा।






