योगेश पगारे: थिएटर से सिनेमा तक की अनोखी यात्रा
कभी सोचा है कि एक व्यक्ति कैसे अपने सपनों को साकार करने के लिए हर चुनौती का सामना कर सकता है? योगेश पगारे की कहानी कुछ ऐसी ही है। मुंबई की गलियों से उठकर, उन्होंने न केवल थिएटर में अपनी पहचान बनाई, बल्कि अब वे भारतीय सिनेमा में एक नया अध्याय लिखने को तैयार हैं। उनकी नई फिल्म, "मनो या ना मनो", 7 नवंबर 2025 को रिलीज़ होने जा रही है, और यह उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
बचपन से थिएटर की ओर रुझान
योगेश का जन्म एक पुलिस परिवार में हुआ, लेकिन उनके दिल में कला की एक अद्भुत लहर थी। स्कूल के नाटकों से लेकर लोक नृत्यों तक, उन्होंने हर जगह अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। छठी कक्षा में उन्होंने अपना पहला नाटक निर्देशित किया और उसके लिए प्रशंसा भी प्राप्त की। मितीबाई कॉलेज में, उन्होंने अभिनय, लेखन और निर्देशन में अपने कौशल को और निखारा, जहाँ उन्हें बालराज साहनी और पृथ्वीराज कपूर पुरस्कार भी मिले। थिएटर ने उन्हें सच्चे अर्थों में अपने करियर की राह दिखाई।
पेशेवर यात्रा की शुरुआत
योगेश की पेशेवर यात्रा की शुरुआत पृथ्वी थिएटर से हुई, जहाँ उन्होंने विवेक ओबेरॉय के साथ मिलकर मोगली का किरदार निभाया। इस नाटक ने उन्हें पहचान दिलाई और मकरंद देशपांडे ने उन्हें अपने पहले पेशेवर हिंदी नाटक में मौका दिया। उन्होंने कई भाषाओं में अभिनय किया और कई प्रसिद्ध निर्देशकों और कलाकारों के साथ काम किया। नाटकों के 100-200 शो ने उनके कौशल को और धारदार बनाया और कहानी कहने की उनकी समझ को गहरा किया।
टेलीविजन का अनुभव
योगेश ने टेलीविजन में भी काम किया, जहाँ उन्होंने "हिप हिप हुर्रे" और "क्योंकि सास भी कभी बहू थी" जैसे शो में बाल कलाकार के रूप में अभिनय किया। लेकिन उन्होंने जल्दी ही महसूस किया कि थिएटर की गहराई उन्हें ज्यादा भाती है। इसके बाद, उन्होंने नाटक लिखने और निर्देशित करने की ओर कदम बढ़ाया, जिससे उन्हें कहानी कहने का एक नया प्लेटफॉर्म मिला।
शॉर्ट फिल्म्स का सफर
योगेश की शॉर्ट फिल्म्स ने उन्हें काफी पहचान दिलाई। उनकी फिल्म "मुलक्कारम: द ब्रेस्ट टैक्स" ने 24 मिलियन से अधिक व्यूज हासिल किए, जबकि "मर्द का रेप नहीं होता" ने भारतीय कानूनों में पुरुषों के दृष्टिकोण को उजागर किया। ये प्रोजेक्ट न केवल उनकी कहानी कहने की तकनीकों को निखारने का माध्यम बने, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्शकों से जुड़ने का भी।
"एक था हीरो" का अनुभव
उनकी पहली फीचर फिल्म "एक था हीरो" अमेज़न प्राइम पर स्ट्रीम हो रही है। यह उनके लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर था, जिसने उन्हें फिल्म उद्योग में स्थापित किया। इस दौरान, उन्होंने अनुपम खेर के साथ भी काम किया, जो उनके लिए एक मार्गदर्शक और मित्र बने।
"मनो या ना मनो": नई उम्मीदें
योगेश की नवीनतम फिल्म "मनो या ना मनो" दर्शकों के बीच काफी उत्सुकता पैदा कर रही है। उनके थिएटर के अनुभव ने उनके फिल्म निर्माण के दृष्टिकोण को प्रभावित किया है। उन्होंने बताया कि थिएटर ने उन्हें अनुशासन और चरित्र को समझने की कला सिखाई, जो अब फिल्मों में भी दिखाई देती है।
भविष्य की योजना
योगेश की यात्रा यहीं खत्म नहीं होती। "मनो या ना मनो" के साथ-साथ, वे कई अन्य प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहे हैं। उनका लक्ष्य ऐसे कहानियाँ बताना है जो दर्शकों को चुनौती दें और गहराई से जुड़ें। थिएटर उनकी नींव है, लेकिन सिनेमा उन्हें व्यापक दर्शकों तक पहुँचने का अवसर देता है।
योगेश पगारे की कहानी हमें यह सिखाती है कि सच्ची कला का कोई सीमित रूप नहीं होता। उनके जैसे कलाकार हमें प्रेरित करते हैं कि हम अपने सपनों का पीछा करें, चाहे रास्ते में कितनी भी बाधाएँ क्यों न आएं।
क्या आपने कभी सोचा है कि आपके सपने साकार करने में क्या सबसे बड़ी चुनौती है? आइए, इस पर चर्चा करें!
"मनो या ना मनो" जल्द ही आपके पसंदीदा प्लेटफॉर्म पर देखने के लिए उपलब्ध होगा।









