रौनकी भवन: एक अनोखी कहानी
जिंदगी कभी-कभी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहाँ हमें अपने डर और विश्वास दोनों का सामना करना पड़ता है। ऐसी ही एक दिलचस्प कहानी है "रौनकी भवन" की, जो हमें बांग्ला सिनेमा की एक नई दुनिया में ले जाती है।
यह कहानी है युवा दुल्हन जुथिका की, जो अपने पति के पुश्तैनी महल में कदम रखती है। वह नई शुरुआत की उम्मीद के साथ घर आती है, लेकिन उसे एक ऐसे माहौल का सामना करना पड़ता है, जहाँ परंपराएँ, छुपे हुए डर, और गायब हो चुकी दुल्हनों की अनकही कहानियाँ उसे घेर लेती हैं। जुथिका की उम्मीदें जल्दी ही एक भयावह सच्चाई में बदल जाती हैं जब उसके ससुर अचानक रहस्यमय तरीके से गिरकर मर जाते हैं। इस घटना से परिवार में फैली दहशत और भी गहरी हो जाती है, क्योंकि उन्हें विश्वास होता है कि उनकी पारिवारिक देवी, रौनकी देवी, को कभी नाराज़ नहीं करना चाहिए।
जुथिका जब इस विशाल और पुरानी हवेली में रहने लगती है, तो उसे यह समझ में आता है कि हर दुल्हन के साथ एक दुखद और रहस्यमय घटना घट चुकी है। ये मौतें और गायब होना मानो किस्मत के खेल में छिपी हुई हों, लेकिन वास्तव में ये तो परंपरा के बोझ के नीचे दबी हुई हैं।
जुथिका ने ठान लिया है कि वह अगली शिकार नहीं बनेगी। वह अपने आस-पास के अंधविश्वास, पीढ़ियों का trauma, और पारिवारिक रहस्यों को उजागर करने के लिए तैयार है। उसका ये सफर विश्वास और संदेह के बीच एक तंग रस्सी पर चलने जैसा हो जाता है, जहाँ उसे यह तय करना होता है कि क्या यह आतंक दिव्य प्रकोप है या फिर कहीं और, कुछ और ही sinister छिपा हुआ है।
"रौनकी भवन" हमें 90 के दशक के ग्रामीण बंगाल का एक शानदार अनुभव देती है, जहाँ मनोवैज्ञानिक भय, विरासत में मिली डर और परंपरा का दवाब सब कुछ एक साथ मिलकर एक दिलचस्प रहस्य का निर्माण करते हैं।
इस फिल्म का प्रीमियर 25 दिसंबर 2025 को होगा, और इसे आप ज़ी5 पर देख सकेंगे।
तो दोस्तों, क्या आप भी जुथिका की इस यात्रा में शामिल होने के लिए तैयार हैं? क्या आप मानते हैं कि परंपरा कभी-कभी हमारे लिए एक भारी बोझ बन जाती है? आइए, इस विषय पर चर्चा करें!









