रांझणा: क्या एआई ने सिनेमा की आत्मा को छीन लिया?
कभी-कभी ऐसा लगता है कि सिनेमा केवल एक मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारी भावनाओं, सोच और जीवन के कई रंगों का प्रतिबिंब है। लेकिन जब इस कलात्मकता को तकनीक के सहारे बदलने की कोशिश की जाती है, तो क्या हम सही कर रहे हैं? हाल ही में रांझणा फिल्म के एक नए संस्करण को लेकर उठे विवाद ने इसी सवाल को जन्म दिया है।
एआई का जादू और रांझणा का नया अंत
2013 में आई फिल्म रांझणा, जिसे आनंद एल राय ने निर्देशित किया था, भारतीय सिनेमा की एक अनोखी कहानी है। इस फिल्म में धनुष और सोनम कपूर ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। हाल ही में, इस फिल्म का तमिल संस्करण "अंबिकापति" एक नए और खुशहाल अंत के साथ पुनः रिलीज़ हुआ। लेकिन यह नया अंत एआई द्वारा उत्पन्न किया गया था, जिससे फिल्म के मूल स्वरूप पर सवाल उठने लगे हैं।
निर्देशक और अभिनेता की प्रतिक्रिया
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर फिल्म के निर्देशक आनंद एल राय और मुख्य अभिनेता धनुष पर पड़ा। दोनों ने इस परिवर्तन के लिए अपनी निराशा व्यक्त की और कहा कि उन्हें इस बारे में कोई सूचना नहीं दी गई। धनुष ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर अपनी राय साझा करते हुए कहा, "इस वैकल्पिक अंत ने फिल्म की आत्मा को छीन लिया है।" उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने इस बदलाव के खिलाफ आपत्ति जताई थी।
सिनेमा की आत्मा बनाम व्यावसायिकता
धनुष ने यह भी कहा कि एआई के उपयोग से सिनेमा की मूल भावना को नुकसान पहुंच रहा है। क्या एक फिल्म में बदलाव करना सही है, भले ही उसका उद्देश्य दर्शकों को लाना हो? क्या तकनीक का उपयोग सृजनात्मकता के साथ भेदभाव कर रहा है? ये ऐसे सवाल हैं जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं।
निष्कर्ष
रांझणा का यह नया संस्करण 1 अगस्त 2025 को रिलीज़ हुआ है, लेकिन इसके साथ आई विवादों की लहर ने सिनेमा के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या हम तकनीक के साथ सिनेमा को बदलने के लिए तैयार हैं, या हमें इसके मूल स्वरूप को बरकरार रखना चाहिए?
आपके विचार क्या हैं? क्या आपको लगता है कि एआई का उपयोग फिल्मों में सही है, या यह केवल कला के साथ खिलवाड़ है?









