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‘Kartavya का अंत समझाया: सैफ अली खान के SHO पवन द्वारा सौरभ द्विवेदी के आनंद श्री की हत्या क्यों नहीं हुई – ड्यूटी की दुविधा को समझते हुए!’

क्यों सैफ अली खान का SHO पवन मलिक आनंद श्री को नहीं मारता?

“महाभारत की लड़ाई के चौदहवें दिन अर्जुन कश्‍मकश में थे। एक दिन पहले उन्होंने अपने बेटे को खोया था और सामने थे गुरु द्रोणाचार्य, जिनका भी हाथ उनकी मृत्यु में था। अर्जुन समझ नहीं पा रहे थे कि अपने गुरु से भिड़ें या नहीं। और फिर धर्म, कर्म और कर्तव्य के बीच अर्जुन ने युद्ध का कर्तव्य निभाया और अपने गुरु से लड़ गए। हम इंसान जंडू प्रसाद हैं, धर्म करते हैं तो कर्म छूट जाता है, कर्म करते हैं तो धर्म छूट जाता है… लेकिन कर्तव्य तक तो कभी बात ही नहीं पहुंचती!”

यह संवाद हमें सैफ अली खान के किरदार SHO पवन मलिक के जटिल मनोविज्ञान में ले जाता है, जो ‘कर्तव्य’ की इस जद्दोजहद में उलझा हुआ है।

क्या पवन मलिक हल कर पाते हैं दुविधा?

पवन मलिक, जो एक संवेदनशील और नैतिक पुलिस अधिकारी हैं, अपने सबसे करीबी लोगों – अपने पिता और एक सहकर्मी के साथ एक कठिन दुविधा का सामना करते हैं। फिल्म ‘कर्तव्य’ में उनकी स्थिति अर्जुन के सामने खड़ी चुनौती की तरह है। लेकिन ध्यान रखें, इस चर्चा में हम फिल्म के अंत के बारे में बात करने जा रहे हैं, इसलिए अगर आपने अभी तक नहीं देखी है, तो इसे पढ़ना रोक दें!

कहानी की जटिलताएं

फिल्म की कहानी एक पत्रकार की हत्या से शुरू होती है, जो एक 16 वर्षीय लड़के के हाथों होती है, जबकि उसे पुलिस सुरक्षा प्राप्त है। यह घटना न केवल एक हत्या है, बल्कि यह पौराणिक कथाओं और समाज की कुरीतियों की गहराई में जाती है।

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सैफ अली खान का चरित्र पवन मलिक अपनी जिज्ञासा और जिम्मेदारी के बीच झूलता है, जब उसे पता चलता है कि उसके सबसे करीबी लोग उसे धोखा दे चुके हैं। उसके पिता हरिहर और सहकर्मी अशोक दोनों ही उसे धोखा देते हैं, जिससे उसे अपने परिवार को बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है।

अंतिम संदेह और कर्तव्य

जब पवन मलिक को पता चलता है कि आनंद श्री (सौरभ द्विवेदी) उस हत्या का मास्टरमाइंड है, तो उसे एक कठिन निर्णय लेना होता है। क्या वह आनंद श्री को खत्म कर देगा? लेकिन वह जानता है कि आनंद श्री बहुत शक्तिशाली है और उसे मारना असंभव होगा।

इसलिए, पवन मलिक ने आनंद श्री को नहीं मारा, बल्कि सबूत उसे सौंप दिए। यह निर्णय भले ही कुछ लोगों को अन्यायपूर्ण लगे, लेकिन असलियत यही है कि एक पुलिस अधिकारी एक भ्रष्ट व्यवस्था से अकेले नहीं लड़ सकता।

क्या है आपका विचार?

पवन मलिक की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सभी में वो साहस है कि हम अपने कर्तव्यों को निभाते हुए अपने भीतर के अर्जुन को पहचानें? क्या आप मानते हैं कि कभी-कभी हमें अन्याय का सामना करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, भले ही यह चुनौतीपूर्ण क्यों न हो?

इस फिल्म को आप नेटफ्लिक्स पर देख सकते हैं।

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