क्या कॉमेडी फिल्मों के बिना हिंदी सिनेमा की कल्पना की जा सकती है?
क्या आपने कभी सोचा है कि अगर हिंदी सिनेमा में "चुपके चुपके" या "अंगूर" नहीं होते, तो क्या होता? उन मजेदार भ्रमों, गलत पहचानों और हलके-फुलके व्यंग्य के बिना हमारा सिनेमा कैसा होता? ऐसा ही एक सवाल है, जिसके जवाब में मुहासर अजीज, "पति पत्नी और वो दो" के निर्देशक, अपनी बात रखते हैं।
कॉमेडी का महत्व
मुहासर अजीज, जो आज के हिंदी सिनेमा के एक मजबूत कॉमेडी कस्टोडियन माने जाते हैं, ने हाल ही में एक बातचीत में इस बात पर जोर दिया कि कॉमेडी बॉलीवुड का सबसे कम सराहा गया जॉनर है। उन्होंने कहा, "हमारी सिनेमा की विरासत में राज कपूर, मनमोहन देसाई और ऋषिकेश मुखर्जी जैसे दिग्गज शामिल हैं। हमें उनकी विरासत को आगे बढ़ाना है।"
विरासत को आगे बढ़ाना
उन्होंने कॉमेडी की महत्वता को समझाते हुए कहा, "क्या आप एक ऐसी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं, जहाँ ‘चुपके चुपके’ नहीं है? या ‘खट्टा मीठा’ नहीं है?" मुहासर का मानना है कि ऐसे दिग्गजों की परंपरा को संजोए रखना बेहद जरूरी है।
सीक्वल बनाने की चुनौती
जब उन्होंने "पति पत्नी और वो दो" के सीक्वल को बनाने के दबाव के बारे में बात की, तो मुहासर ने इसे जिम्मेदारी की तरह देखा। उन्होंने कहा, "एक फिल्म निर्माता की जिम्मेदारी होती है कि वह अपनी लेखनी के माध्यम से एक ऐसी कहानी खोजे, जो पिछले संस्करण से कहीं ज्यादा प्रभावी हो।"
कॉमेडी का जश्न मनाना
उनका यह भी कहना है कि कॉमेडी फिल्म निर्माताओं को वो मान्यता नहीं मिलती, जिसके वे हकदार हैं। उन्होंने कहा, "दुनिया भर में यही होता है। लोग हंसते हैं, लेकिन यह नहीं सोचते कि इसे बनाने में कितना मेहनत लगी है।" मुहासर ने यह भी कहा कि उनके लिए यह गर्व की बात है कि उन्होंने अक्षय कुमार, आयुष्मान खुराना और कार्तिक आर्यन जैसे शानदार कॉमिक अभिनेताओं के साथ काम किया है।
अगर आप भी कॉमेडी को एक महत्वपूर्ण जॉनर मानते हैं, तो क्यों न हम सभी मिलकर इसे और भी बेहतर बनाने की कोशिश करें?
"पति पत्नी और वो दो" अब Zee5 पर स्ट्रीमिंग हो रही है।
आपकी राय?
क्या आपको लगता है कि कॉमेडी फिल्मों को बॉलीवुड में और अधिक मान्यता मिलनी चाहिए? क्या आप किसी कॉमेडी फिल्म को याद करते हैं, जिसने आपकी जिंदगी में खास प्रभाव डाला हो?






